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नवरात्रि के पांचवें दिन स्कंदमाता की उपासना…

नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभ्रदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी।।



देवी मां का पांचवा स्वरूप स्कंदमाता का है। स्कंदमाता को ही महेश्वरी, गौरी और पार्वती कहते हैं। भगवान स्कंदजी बालरुप में इन्हीं के गोद में विराजते हैं। सौभाग्य की देवी स्कंदमाता असुरों का दमन करने वाली और परम वैभवशाली है। सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज और कांति से संपन्न हो जाता है। कथा है कि एक बार असुर तारकासुर ने घोर तपस्या करके ब्रह्माजी से अक्षत जीवन का वर ले लिया था। बह्माजी ने वरदान तो दे दिया पर कहा कि आना-जाना तो इस सृष्टि का नियम है। इससे कोई नहीं बच सकता। इस पर धूर्त तारकासुर ने वर मांगा कि उनकी मौत हो तो सिर्फ शिवजी के पुत्र के हाथों। बह्माजी ने भी तथास्तु कह दिया। अब तारकासुर निरंकुश हो गया। उसने सोचा न तो शिव कभी विवाह करेगे और उसकी मौत होगी। तारकासुर ने ऐसा उत्पात मचाया कि सारा संसार त्राहि-त्राहि कर उठा। देवगण शिवजी की शरण में पहुंचे और सार व्यथा-कथा कह सुनाई। उनके काफी अनुनय-विनय सदाशिव ने साकार रुप धारण कर पार्वतीजी से विवाह रचाया। कालांतर में शिव-पार्वती कार्तिकेय या स्कंदकुमार ने तारकासुर को यमलोक पहुंचाया। स्कंदमाता के स्वरुप के साथ ही माता और पुत्र संबंध की नींव पड़ी। पांचवे नवरात्र को इन्ही स्कंदमाता की पूजा होती है। शास्त्रों में पांचवे नवरात्रि को पुष्कल का महत्व बताया गया है। स्कंदमाता की चार भुजाएं है। इनका वर्ण शुभ्र है। स्कंदमाता की आराधना के समय साधक मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित रहता है। स्कंदमाता की पूजा करने वाले भक्तों का मन सांसारिक मोहमाया की आरधना का मंत्र है-
नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभ्रदास्तु सदा देवी स्कंदमाता यशस्विनी।।

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