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गंभीरता ही धर्म का आधार है, क्षुद्रता केवल विनाश लाती है : प्रियदर्शी विजय जी महाराज

मुनि श्री ने कहा – जिसने स्वयं को समझा, वही धर्म को जान सका



रायपुर। मुनि श्री प्रियदर्शी विजय जी महाराज साहब ने सोमवार 14 जुलाई के अपने प्रवचन में कहा क्षुद्र ‘ शब्द का प्रयोग तुच्छ, क्रूर, दरिद्र आदि अनेक अर्थों में किया जाता है; परंतु यहाँ क्षुद्र का अर्थ है अगम्भीर। धर्म ग्रहण करने का अधिकारी कौन है ? कहा गया है कि जो व्यक्ति गम्भीर है, किसी वस्तु के दर्शन में या किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में वह स्थूल बुद्धि से निर्णय लेने वाली नहीं होता ! क्योंकि स्थूल बुद्धि से लिया गया निर्णय व्यक्ति को शत्रुता की स्थिति में ले जाने वाला बन जाता है। हमारा मूल विचार यह था कि एक ‘अक्षुद्र’ व्यक्ति ही धर्म को समझ सकता है, धर्म को प्राप्त कर सकता है और धर्म में स्थिर रह सकता है। उस व्यक्ति में निहित गंभीरता उसे अनेक प्रकार के गुणों का पात्र बना सकती है! समुद्र बच्चों को भी दिखाई देता है और गोताखोरों को भी। बच्चों के लिए समुद्र सीपियों का भण्डार मात्र है, जबकि गोताखोरों के लिए समुद्र रत्नों का भण्डार है। एक की दृष्टि सतह तक ही सिमीत रहती है, क्षुद्र होती है, तो दूसरे की गंभीर। किसी वस्तु को सतह तक की ही दृष्टि से देखने पर उसका उचित न्याय नहीं हो पाता, जबकि किसी वस्तु को गंभीर दृष्टि से देखने पर उसका न्याय कर पाने की संभावना बनी रहती है। क्षुद्रता अनेक दोष लाती है क्षुद्रता अनेक प्रकार के दोष लाती है। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह व्यक्ति को अन्य प्राणियों के साथ अधिक समय तक मित्रता बनाए रखने नहीं देता, क्योंकि दूसरे के दोष देखने के बाद, व्यक्ति में उन्हें पचाने की शक्ति नहीं रहती। अत्यधिक खुशी या अत्यधिक दुःख में, वह किसी भी समय दूसरे व्यक्ति के अकथनीय दोषों को बोल देता है और नतीजा यह होता है कि सामने वाले का दिल दुखता है। उसके मन में दूसरे के प्रति दुर्भावनाएँ पनपती हैं और अंततः दोस्ती टूट जाती है। क्षुद्रता का एक और दोष यह है कि छोटी-छोटी बातों में भी क्षुद्र व्यक्ति कभी खुश तो कभी दुखी हो जाता है। संक्षेप में, छोटी-छोटी बातें भी क्षुद्र व्यक्ति के मन में राग-द्वेष के भूचाल ला देती हैं। चाय गरम मिली, दूध में चीनी है, सब्ज़ी मसालेदार है , किसी ने तारीफ़ के दो शब्द कह दिए, बस, मज़ा ही मजा ! और इसके विपरीत, चाय ठंडी मिली, दाल में नमक रह गया, किसी ने अपमान कर दिया, तो देखो, उसका चेहरा बिगड़े बिना नहीं रहता और घर वगैरह में, शायद बड़े की जगह पर रहे हुए व्यक्ति हो क्रोधादि के द्वारा पूरे घर का वातावरण कलुषित हो जाता हैं , किसी कुत्ते को लकड़ी से मारो और बाद में उसे “तू तू तू तू” कहकर पुकारो और दो रोटियाँ दिखाओ, कुत्ता तुरन्त अपनी पूँछ हिलाता हुआ चला आता है। बस, तुच्छ मनुष्य का व्यवहार भी इस कुत्ते जैसा ही होता है। उसे न ही कभी प्रसन्न होते समय लगता , न कभी क्रोधित होते हुए। क्षुद्र व्यक्ति का व्यवहार तुच्छ होता है, तुच्छ व्यवहार से व्यक्ति धन तो बचा सकता है, लेकिन अपने ही परिवार का प्रेम हमेशा के लिए खो देता है। इस संसार में धन की हानि की पूर्ति धन से की जा सकती है; लेकिन प्रेम की हानि की पूर्ति धन से कभी नहीं की जा सकती। तुच्छ व्यक्ति प्रेम या मित्रता की ज़्यादा परवाह नहीं करता। वह सजीव व्यक्ति से ज़्यादा निर्जीव वस्तुओं को महत्व देता है और इसीलिए निर्जीव वस्तुओं से प्रेम करके वह भी निर्जीव वस्तु जैसा बन जाता है। उसके संसार में भावना, स्नेह, प्रेम, संवेदनशीलता जैसा कुछ भी नहीं है जो कुछ है, वह केवल ‘स्वार्थ’ में ही लीन है। शास्त्रों ने इस संसार में चार प्रकार के प्राणी बताए हैं –

  • जो दूसरों को सुख देकर सुखी होते हैं, वे श्रेष्ठ हैं।
  • जो दूसरों को सुखी देखकर सुखी होते हैं, वे औसत हैं।
  • जो दूसरों को दुखी देखकर सुखी होते हैं, वे अधम हैं।
  • जो दूसरों को दुखी करके सुखी होता है, वह अधमाधम है। क्षुद्र व्यक्ति को अधमाधम माना जाता है।

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