धर्म मार्ग में सफलता का आधार है सुपक्ष युक्त परिवार”: श्री प्रियदर्शी विजय जी म.सा.
जहाँ परिवार धर्ममय हो, वहाँ आत्मा मुक्तिमय हो, धार्मिक वातावरण: आत्मा की उन्नति का मूल

रायपुर। आज के समय में जब भौतिकता की अंधी दौड़ में नैतिकता और आत्मिक चेतना कहीं पीछे छूटती जा रही है, ऐसे में सुपक्ष युक्तता (धर्म युक्त परिवार) का विचार अत्यंत प्रासंगिक और आवश्यक बन गया है। धर्मरत्नप्रकरणकार जैसे महान आचार्यों ने धर्म की प्राप्ति के लिए जिन गुणों को अनिवार्य माना है, उनमें सुपक्ष युक्तता एक अत्यंत महत्वपूर्ण गुण है। धार्मिक विचारक परम पूज्य तीर्थ प्रेम विजय जी मारा साहब ने आज के प्रवचन में कहा कि – “जिस व्यक्ति का परिवार धर्म में सहायक हो, धर्म में बाधा न डाले, सदाचारी हो – वह व्यक्ति बिना किसी व्यवधान के आत्मिक उन्नति कर सकता है।

आत्मा का दीर्घकालिक भ्रमण और पापवृत्तियों से मुक्ति
अनादिकाल से संसार में भ्रमण करती हुई आत्मा ने पाप की प्रवृत्तियों को ही अपना आधार बनाया है। ऐसे में यदि हम उसे धर्म के मार्ग पर अग्रसर करना चाहते हैं, तो एक धर्ममय वातावरण अनिवार्य है – जैसे सर्दी के रोगी को दही से दूर रखा जाता है, वैसे ही आत्मा को पापी संग और कुसंस्कारों से दूर रखना आवश्यक है।
धार्मिक प्रेरणा और सही संगति का महत्व
हर जीव के भीतर स्वतः धर्मभाव उत्पन्न नहीं होता; इसके लिए प्रेरणा और संगति का होना आवश्यक है। धार्मिक आत्माओं का सान्निध्य, सत्संग, और परिवार की प्रेरणा व्यक्ति को धार्मिक गतिविधियों की ओर सहजता से ले जाती है। यदि पिछले जन्मों के कर्मवश व्यक्ति को धर्मी परिवार नहीं मिला हो, तो उसे पुरुषार्थ से किसी धर्मात्मा का संग प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।
धर्मी परिवार के लाभ:
धर्म कार्यों में किसी प्रकार की बाधा नहीं आती
परिवार के संस्कार बच्चों में धार्मिकता विकसित करते हैं
माता-पिता द्वारा दिया गया धार्मिक वातावरण जीवनभर प्रभावी रहता है
धर्मिक चर्चा, व्रत, उपवास, सत्संग – इन सबमें सहजता से रुचि पैदा होती है
धार्मिक संस्कारों का बचपन में बीजारोपण
बचपन में दिए गए संस्कार व्यक्ति के जीवन की दिशा तय करते हैं। यदि माता-पिता प्रारंभ से ही बच्चों में धार्मिकता, संयम, नम्रता और सदाचरण के बीज नहीं बोते, तो बड़े होकर वे भटक जाते हैं। शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि –
“जो माता-पिता बच्चों के संस्कारों के प्रति लापरवाह रहते हैं, वे चांडाल की श्रेणी में आते हैं।” धार्मिक दृष्टांत में एक कुम्हार और घड़े की कथा के माध्यम से बताया गया कि जैसे घड़े को मजबूत बनाने के लिए अग्नि में तपाया जाता है, वैसे ही बच्चों को भी उचित समय पर अनुशासन में लाना आवश्यक होता है। कोमलता की अति बच्चों के भविष्य को दुर्बल बना सकती है। धार्मिक वातावरण में पले-बढ़े व्यक्ति के लिए धर्म का पालन स्वाभाविक बन जाता है। यदि समाज को संस्कारित करना है, तो प्रत्येक घर को एक लघु तीर्थ के रूप में परिवर्तित करना होगा। धर्मयुक्त परिवार ही सच्चे समाज निर्माण की नींव हैं।
आगामी कार्यक्रमों की झलक:
- प्रत्येक दिन प्रातः 6:00 बजे – सुप्रभात महाभिषेक
- दोपहर 2:30 बजे – साध्वी श्री का महिलाओं हेतु विशेष प्रवचन
समस्त श्रद्धालुओं से अनुरोध है कि प्रतिदिन के आयोजनों में अधिक से अधिक संख्या में सम्मिलित होकर धर्मलाभ प्राप्त करें, तथा अपने बच्चों और परिवारजनों को संस्कारों से परिपूर्ण वातावरण का लाभ दें।
