गुरु की डाँट में ही मोक्ष का मार्ग छिपा है : तीर्थ प्रेम विजय जी म.सा.
रायपुर। भावोल्लास चातुर्मास समिति एवं विमलनाथ जैन मंदिर ट्रस्ट के तत्वावधान में चल रही चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला में आज परम पूज्य तीर्थ प्रेम विजय जी म.सा. ने उत्तराध्ययन सूत्र के गूढ़ ज्ञान को सरल शैली में प्रस्तुत करते हुए गुरु-शिष्य संबंध की महिमा पर प्रकाश डाला।

तीर्थ प्रेम विजय जी म.सा. ने कहा, “यदि गुरु अपने शिष्य को डाँटते हैं, कठोर वचन कहते हैं या क्रोध करते हैं, तो उसे शिष्य को हँसकर सहन करना चाहिए, न कि अपने मन में ईर्ष्या या द्वेष उत्पन्न करना चाहिए।” उन्होंने स्पष्ट किया कि गुरु का क्रोध, डाँट और प्रेम— गुरु धर्म के ही रूप हैं। इन सभी के पीछे उद्देश्य केवल शिष्य को मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करना होता है। शिष्य को पूर्ण समर्पण के साथ गुरु के अधीन रहना चाहिए और गुरु की अनुमति के बिना कोई कार्य, यहाँ तक कि झपकी लेना भी उचित नहीं माना गया है।
गुरु भगवंत के अनुसार, दो प्रकार के शिष्य होते हैं:
- पात्र शिष्य:
जो गुरु की प्रत्येक बात को बिना कहे ही समझ जाता है, और बार-बार समझाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। - अपात्र शिष्य:
जिसे हर बात बार-बार समझानी पड़ती है और जो गुरु के बिना कहे कुछ नहीं समझता।
गुरु और शिष्य का आदर्श संबंध वही है, जिसमें शिष्य बिना कहे गुरु की भावना को समझ सके। ऐसा शिष्य निश्चित ही आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ता है। ज्ञान की सर्वोच्चता पर प्रकाश डालते हुए तीर्थ प्रेम विजय जी म.सा. ने “सूत केवली” और 14 पूर्व ज्ञान की चर्चा की। उन्होंने बताया कि यह ज्ञान अत्यंत विशिष्ट और दुर्लभ है, जो केवल अनंत तप और प्रभु ध्यान से ही प्राप्त होता है। यह ज्ञान केवलज्ञान के समकक्ष होता है और इसकी तुलना हाथी की लंबाई में सुखी स्याही से लिखे गए ग्रंथों से की गई है।
- विशेष कार्यक्रम
- सुप्रभात अभिषेक : प्रतिदिन प्रातः 6:00 से 6:25 बजे तक
- मुख्य प्रवचन : प्रतिदिन प्रातः 9:00 से 10:00 बजे तक
- महिलाओं हेतु विशेष साध्वी प्रवचन : प्रतिदिन दोपहर 2:30 से 3:30 बजे तक
