लैलूंगा में आदिवासी भूमि पर बड़ा फर्जीवाड़ा! तहसीलदार पर गंभीर आरोप, राजस्व विभाग में हड़कंप
लैलूंगा/घरघोड़ा (गौरी शंकर गुप्ता)। रायगढ़ जिले के लैलूंगा क्षेत्र में आदिवासी भूमि हड़पने का बड़ा मामला सामने आया है। खसरा नंबर 622/12 और 502/6 की लगभग 1290 वर्गफुट भूमि का फर्जी नामांतरण कर नियमों को ताक पर रखते हुए महज़ ₹3.60 लाख में रजिस्ट्री कर दी गई, जबकि भूमि की वास्तविक कीमत ₹1.68 करोड़ से अधिक बताई जाती है। शिकायतकर्ताओं ने लैलूंगा राजस्व विभाग के एक अधिकारी और कर्मचारियों पर मिलीभगत, भ्रष्टाचार और जांच में लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए हैं। मामला संयुक्त कलेक्टर प्रियंका वर्मा के संज्ञान में आने के बाद प्रशासन में हलचल मची हुई है।

क्या है आरोप?
- मृतक जहर साय नि:संतान थे, पर उनके 14 वारिस मौजूद हैं—इसके बावजूद छत्तर साय के नाम फर्जी तरीके से नामांतरण।
- उत्तराधिकार जांच, वारिसों की सूचना, ग्राम पंचायत की रिपोर्ट—कुछ भी नहीं लिया गया।
- एक ही प्रकरण में दो-दो आदेश जारी, वह भी बिना जांच।
- भूमि को कृषि भूमि दिखाकर स्टांप शुल्क सिर्फ ₹24,000 लिया गया।
ड्राइवर की क्या है भूमिका…
भूमि खरसिया निवासी सेठ वर्ग द्वारा अपने ड्राइवर गोविंद राम सिदार के नाम रजिस्ट्री कराई गई। शिकायतकर्ताओं के अनुसार गोविंद इसकी वास्तविक कीमत चुकाने में सक्षम नहीं, इसलिए वह केवल “मोहरा” है।
शिकायतकर्ताओं की मांगें
- उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच
- फर्जी नामांतरण निरस्त
- तहसीलदार व पटवारी पर कार्रवाई
- भूमाफियाओं व खरीदार की आर्थिक जांच
- स्टांप चोरी और राजस्व हानि की अलग जांच
ग्रामीणों में रोष
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सिर्फ एक मामला नहीं बल्कि आदिवासी भूमि हड़पने का संगठित नेटवर्क है, जिसे प्रशासनिक संरक्षण मिला है।
शिकायतकर्ताओं के बयान
रघुनाथ सिंह: “मैं जहर साय का सगा भतीजा हूं, फिर भी मेरा नाम वारिसों में नहीं जोड़ा गया। तहसीलदार ने मनमानी की है।”
सहदेव सिंह सिदार: “हमने कई बार आवेदन दिए, लेकिन किसी को बुलाया तक नहीं गया। सब कुछ पहले से तय था।”
“शिकायत मिली है। सभी दस्तावेजों की जांच हो रही है। आरोप सही पाए गए तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।”
– भरत कौशिक, एसडीएम लैलूंगा
