मैनपाट में प्रस्तावित बॉक्साइट खदान पर बवाल : जनसुनवाई से पहले उखड़े टेंट, ग्रामीणों का तीखा विरोध
अंबिकापुर,मैनपाट( गौरीशंकर गुप्ता)। मैनपाट में प्रस्तावित बॉक्साइट खदान को लेकर तनाव और भारी विरोध प्रदर्शन ने जनसुनवाई के माहौल को पूरी तरह बदल दिया है। स्थानीय ग्रामीणों और आदिवासी समुदायों में खदान के कारण होने वाले पर्यावरणीय और सामाजिक खतरों को लेकर गहरा असंतोष व्याप्त है। मैनपाट क्षेत्र के कंडराजा, नर्मदापुर, उरंगा सहित कई गांवों के लोग इस खदान के खतरों को समझते हुए इसे ठुकरा रहे हैं और अपनी आजीविका, जंगल, जलस्रोत व हाथी समेत वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए मुखर होकर खड़े हैं।

प्रस्तावित खदान और विवाद की जड़
मेसर्स मां कुदरगढ़ी स्टील्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा मैनपाट क्षेत्र में 135 हेक्टेयर भूमि पर बॉक्साइट खनन परियोजना प्रस्तावित है। कंपनी का दावा है कि इससे क्षेत्र में रोजगार सृजन होगा और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि यह खदान उनके पहाड़, जंगल, और जलस्रोतों को नष्ट कर देगी, जिससे खेती और आजीविका बुरी तरह प्रभावित होगी। अतिरिक्त रूप से, यह परियोजना हाथी और अन्य वन्य जीवों के आवास क्षेत्र को नुकसान पहुंचा सकती है, जिससे मानव-वन्य जीव संघर्ष बढ़ेगा। स्थानीय लोगों का तर्क है कि सालाना 80,700 टन बॉक्साइट उत्खनन के कारण पहाड़ियों का कटाव तेज होगा, भूजल स्तर कम होगा, जल प्रदूषण बढ़ेगा और सड़क दुर्घटनाओं में वृद्धि होगी। इसके अलावा, खदान के लिए लगाए गए ट्रकों की आवाजाही से आसपास के गांवों में धूल और प्रदूषण फैलने की संभावना है, जो लोक स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक है।
जनसुनवाई से पहले के विरोध
जिला प्रशासन द्वारा 30 नवंबर को नर्मदापुर स्टेडियम में सरकारी जनसुनवाई के आयोजन की सूचना के बाद क्षेत्र के गांवों में भारी विरोध उभरा। कंडराजा, नर्मदापुर, बहिसा, उरंगा, चोरकीपानी, पेठ समेत अन्य गांवों के ग्रामीणों ने इस जनसुनवाई को खदान के समर्थन में प्रशासन की एक नियंत्रित प्रक्रिया बताया। वे चाहते थे कि खदान के दुष्प्रभावों को गंभीरता से महसूस किया जाए और उनसे जुड़े सभी सवालों का सुलझाव हो। प्रदर्शनकारियों ने जिला प्रशासन द्वारा लगाए गए टेंट और पंडाल को उखाड़ फेंका। विरोध के पीछे मुख्य नेतृत्व जिला पंचायत सदस्य रतनी नाग कर रही थीं, जिनका कहना था कि प्रशासन स्थानीय लोगों के वास्तविक आक्रोश और चिंता को नजरअंदाज कर रहा है। उन्होंने साफ कहा कि वे जंगल, पहाड़ और जलस्रोतों को तभी खदान खोलने की अनुमति देंगे जब उनके चिंताओं का समाधान हो। मैनपाट क्षेत्र की अधिकांश आबादी खेती, जंगल से मिलने वाले संसाधनों और पशुपालन पर निर्भर है। इस क्षेत्र में प्राकृतिक सौंदर्य और जैव विविधता का खजाना मौजूद है, जिसकी सुरक्षा की मांग ग्रामीण कर रहे हैं। खदान से जुड़े कार्यों से इन प्राकृतिक संसाधनों का विनाश होने का खतरा है, जिससे उनकी आजीविका संकट में पड़ सकती है। स्थानीय निवासियों का यह भी कहना है कि खदान के कारण जलस्त्रोतों में सूखा पड़ सकता है और खेती प्रभावित होगी। भूजल स्तर का गिरना और नदी-नालों का प्रदूषित होना उनकी खेती और इन परिवारों के रोज़मर्रा के जीवन में बाधा उत्पन्न करेगा। साथ ही, खदान के कारण बढ़ने वाले मानव-वन्य जीव संघर्ष से क्षेत्र में सुरक्षा की स्थिति भी खराब हो सकती है। जनसुनवाई के समय हिंसा भड़कने और टेंट-पंडाल उखड़ जाने के बाद प्रशासन ने सुरक्षा कड़ी कर दी है। पुलिस बल को माहौल नियंत्रित करने के लिए तैनात किया गया है। प्रशासन का पक्ष है कि वे सभी पक्षों की सुनवाई करना चाहते हैं, परंतु अराजकता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सरकार सड़क बांधने, रोजगार देने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी प्राथमिकता देती है। लेकिन यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि सभी प्रक्रिया कानून के दायरे में रहें और किसी भी तरह की हिंसा न हो। पर्यावरण कार्यकर्ता और सामाजिक संगठन स्थानीय लोगों के समर्थन में खड़े हैं। उनका मानना है कि मैनपाट क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता और वन्य जीवन को खतरा पहुंचाने वाली किसी भी परियोजना को मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए। स्थायी विकास के पैमाने पर खदान के पर्यावरणीय प्रभाव का गंभीर मूल्यांकन आवश्यक है। ग्रामीणों और पर्यावरण समर्थकों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन और कंपनी उनकी बातों को नजरअंदाज करते हैं, तो वे बड़े पैमाने पर आंदोलन की योजना बना रहे हैं। उनके अनुसार, यह केवल स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के प्राकृतिक और सामाजिक तंत्र की रक्षा का सवाल है।
