शत्रुंजय तप में प्रथम पचकान का दिव्य आयोजन, 100 तपस्वियों ने लिया प्रथम तेले उपवास पचकान

रायपुर। शत्रुंजय गिरिराज की 500वीं ध्वजा की महिमा को समर्पित तप आराधना का दिव्य आयोजन प्रारंभ हुआ, जिसमें आज प्रथम पचकान का दिवस अत्यंत श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। इस विशेष अवसर पर 100 तपस्वियों ने प्रथम पचकान (तेले उपवास) का संकल्प लेकर तप की शुरुआत की। कार्यक्रम का शुभारंभ संभव जी लुनिया खैरागढ़ द्वारा मधुर संगीत और भक्ति रस में डूबे हुए स्तवनों से किया गया। उन्होंने सिद्धाचल, विमलाचल और शत्रुंजय गिरिराज की महिमा का गुणगान करते हुए भक्तों को भावविभोर कर दिया। “विमलाचलगिरि राज मने प्यारो लागे रे…” जैसे भजनों ने वातावरण को दिव्यता से भर दिया। इसके उपरांत तपस्वियों का भव्य सम्मान हुआ और भगवान की प्रतिमा के समक्ष अक्षत से मौन संकल्प के साथ फेरी दी गई। पाँच-पाँच की श्रेणी में सभी तपस्वियों ने धर्म की विधिपूर्वक आराधना की।


गुरुदेव श्री तीर्थ प्रेम विजय जी महाराज साहब ने शत्रुंजय गिरिराज की अद्भुत महिमा का विस्तृत विवेचन किया। उन्होंने एक सच्ची घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि एक रोगग्रस्त व्यक्ति जिसने शत्रुंजय की यात्रा को अपनी अंतिम इच्छा माना था, वह न केवल गिरिराज की तलेटी तक पहुँचा, बल्कि दादा आदिनाथ के दर्शन के पश्चात चमत्कारिक रूप से स्वस्थ हो गया और बाद में उसी ने मुनि दीक्षा लेकर 400 चतुर्विहार उपवास सहित अनेक यात्राएँ पूर्ण कीं। आज वे आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए। इस प्रेरणादायक प्रसंग से सभी तपस्वियों को तप की शक्ति और शत्रुंजय की कृपा का वास्तविक बोध हुआ। संपूर्ण कार्यक्रम श्री विमलनाथ मंदिर जैन ट्रस्ट एवं भावलास चातुर्मास समिति के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। अंत में सभी तपस्वियों ने सामूहिक चेत्यवंदन में भाग लिया, जो प्रातः 6 बजे से 6:25 तक गुरु भगवन्तों के निर्देशन में सम्पन्न हुआ। आगामी दिनों में नौ प्रकार के तप: तेले, व्यासना, बेला, ब्यासना आदि क्रमशः संपन्न होंगे। 29 दिनों तक चलने वाले इस विशिष्ट आयोजन में प्रतिदिन प्रवचन और तप क्रियाएं साध्वीजी भगवंत और गुरुजन के मार्गदर्शन में सम्पन्न होंगी। उक्त जानकारी राहुल कोचर एवं अरुण बरलोटा ने दी।
